Events - Kadam Badhate Chalo - अपनी सोच में बदलाव, महिलाओं की सुरक्षा अपने आप

अपनी सोच में बदलाव, महिलाओं की सुरक्षा अपने आप

Date: 27/01/2017  To 27/01/2017

Venue: Jaipur, Rajasthan



राजस्थान राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण, मार्था फैरेल फ़ाउंडेशन व पार्टिसिपेटरी रिसर्च इन एशिया, (PRIA) के सयुंक्त प्रयास से जनवरी 27, 2017 को, पुलिस पदाधिकारियों और वार्ड पार्षदों के लिये महिला हिंसा व लिंगभेद के विरूद्धएक कार्यशाला का आयोजन किया गया।

इस कार्यशाला के दौरान ज़्यादातर लोग इस बात पर तो सहमत थे कि हमें हमारी सोच को बदलने की ज़रूरत है और महिलाओं को समान अधिकार तथा सुरक्षा सुनिश्चित करना चाहिये पर जब स्वयं के विचार सामने आये तो कहने में करने में और सोचने में बहुत फ़र्क़ सामने आया। जब यह कहा गया कि किसान के बारें में सोचते हुये कुछ कागज़ पर चित्रण करना है तो ज़्यादातर प्रतिभागियो ंने पुरूष को ही किसान के रूप में चित्रित किया। जब इस बात की चर्चा की गयी कि औरत भी तो खेतों में काम करती है, अनाज की सफ़ाई करती है, कटाई करती है आदि खेतों से जुड़े कई काम करती हैं तो वो किसान क्यों नहीं मानी जाती है। जब किसानों के लिये योजनाओं का लाभ लेने की बात आती है तो केवल और केवल पुरूषों का ही नाम आगे आता है। इस बात पर सब सहमत हुये कि यह बात तो सोची ही नहीं कि महिला को किसान क्यों नहीं माना जाता पर ये कहा कि ज़्यादातर काम तो पुरूष करते है शायद इसलिये पुरूषों की गिनती की जाती है।

इसी तरह जब पुरूष और महिला के बारें उनकी सोच जानी गयी तो पुरूषों के लिये घर का मुखिया, बलशाली, ताकतवर, सहनशील, धैर्यवान, कठिन कार्य करने वाला जैसे नाम दिये गये जबकि महिला के लिये ममतामयी, सुन्दर, बच्चों को पालने वाली, ईमानदार, शारीरिक रूप से कमज़ोर , घर को संभाल कर रखने वाली, मैजिक, सहनशील आदि जैसे नाम दिये गये। यहां तक यह कहा गया कि जब हम पुरूष को सुन्दर कहते है तो इसका मतलब उसके दिमाग का तेज होना है पर जब यही शब्द महिलाओं के लिये कहते है तो उसका मतलब उसकी शारीरिक सुन्दरता से होता, उसकी शारीरिक बनावट को देखा जाता है। एक ही शब्द के दो मायने और दोनों में इतना फ़र्क़ हमारी सोच और मानसिकता को बताने के लिये पर्याप्त हैं। जब इन सब नामों को आपस में बदलकर बात की गयी तो ये सामने आया कि ये सब हमारे ही दिये गये नाम है, हमने अपनी सुविधा से, अपनी आप को सर्वोपरी रखने के लिये इस तरह की भिन्नतायें पैदा कर दी है। प्रकृति ने दोनो को एक जैसे पैदा किया है पर हम जन्म से ही उनके बीच में भिन्नतायें पैदा करते है, हमारी सोच ने ही लड़के और लड़कियों के लिये अलग - अलग खि़लौने, खेल, काम, पहनावा, रिवाज़, संस्कार और यहां तक घर से बाहर जाने के लिये भी नियम कानून तय कर दिये हैं पर इसमें भी भेद किया गया न तो लड़कों को कभी पाबन्दी में रखा गया न ही उनको घर की इज़्जत और अपनी नाक से जोड़ा पर लड़कियों को घर की इज़्जत और परिवार की नाक से हमेंशा जोड़ा जाता है। लोगो को लिंग और सेक्स के बीच का अन्तर नहीं पता और इसी वजह से महिलाओं या लडकियों के साथ हिंसा और भेदभाव जैसी घटनायें होती हैं।

जब यह बताया गया कि श्सामाजिक लिंगश् समाज में आदमी व औरत के कार्यों व व्यवहारों को परिभाषित करता है यह मानव के द्वारा निर्मित है और परिवर्तनशील है। जबकि श्प्राकृतिक लिंगश् आदमी और औरत को परिभाषित करता है जो कि प्राकृतिक हैं तथ कभी भी इसमें परिवर्तन नहीं हो सकता। इस कार्यशाला के दौरान कई बार यह सामने आया कि जब भी हमें हमारी सोच को बदलने की बात आती है तो हम कहते है कि यह प्राचीन समय से चली आ रही है, परम्परा है, हमारे बुज़ुर्गो की बनाई गयी है और यह भी प्राकृतिक ही है जिसे बदलना संभव नही होता हैै। जब इस अन्तर का , भेद का कारण खोजने की बात आयी, तो किसी के पास कोई जबाब नहीं था कि यह सब कहां से आया किसने बनाया और क्यों ? जब यह पूछा गया कि क्या किसी भी महापुरूष ने, किसी धार्मिक ग्रन्थ में यह सब लिखा गया है तो किसी के पास कोई जवाब नहीं था सिवाय संस्कृति की दुहाई के। असल समस्या हमारी मानसिकता में है, सोच में है हमारे विचारो में है। कुछ लोगां ने कहा कि लड़का या लड़की के होने में औरत की ही ज़िम्मेदारी है और महिला के दिमाग का वजन पुरूषों से कम होता है। जब कार्यशाला में उपस्थित छात्रों ने विज्ञान के तथ्यों को सामने रख कर बताया कि लिंग निर्धारण के लिये केवल और केवल पुरूष ही ज़िम्मेदार होते है पर ये तो कोई भी निश्चित नहीं कर सकता कि लड़का होगा या लड़की तो फ़िर महिला ही ज़िम्मेदार क्यों ? तब यह कहा गया कि इस बात का तो हमें पता ही नहीं, हमें तो बस यह पता है कि बच्चे पैदा करना केवल औरत की ही जिम्मेदारी है तो लिंग निर्धारण के लिये भी महिला ही जिम्मेदार है। सवाल यह है कि जब पढे लिखे लोंगो की सोच इस तरह की है तो और लोगों की मानसिकता क्या होगी ? इस बात का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। एक तरफ़ कामाख्या के मन्दिर में हम मासिक धर्म वाली एक चीर का टुकड़ा लेने के लिये हर साल हज़ारों लाखों लोग जुड़ते हैं, उसे पवित्र मानते हैं, पूजते हैं तो फ़िर मासिक धर्म के समय हम लोग महिला को रसोई, मन्दिर, यंहा तक बाहर जाना, अपने खाने के बर्तनों, अपने सोने के बिस्तरों को तथा पहने गये कपडों को किसी और से साफ़ करवाना भी गलत मानते हैं यानि उसे एक तरह से अछूत बना दिया जाता हैै। एक ही देश में इस तरह की भिन्नता क्यों ? ये भी सोचने की बात है। महिला का बच्चे पैदा करना, प्रजनन अंग और मासिक धर्म बस यही वो है जो उन्हें पुरूषों से अलग बनाता है और ये प्राकृतिक है, इनके अलावा सभी अन्तर सामाजिक है जो कि हमारे द्वारा बनाये गये है, जो कि परिवर्तनीय है इसे बदला जा सकता है। प्राकृतिक को बदलना संभव नही पर जो सामाजिक है इसे तो बदल सकते है। आये दिन हम समाचार पत्रों और न्यूज़ चैनलों पर महिलाओं के साथ अत्याचार और भेदभाव की ख़बरें ये सोचने पर मजबूर कर देती है कि क्या महिलाओं को सचमुच उनका अधिकार मिला है? क्या वो निडर होकर जीने की कल्पना कर सकती है क्या आज भी वो कदम कदम पर असुरक्षा की भावना लिये हुये तो नहीं जी रही है।? वह अपनी सुरक्षा को लेकर आश्वस्त क्यों नही हो जाती ? जब तक इंसान अपने मनोंरजन के लिये विपरीत लिंगो का इस्तेमाल करने की मानसिकता को नहीं बदलेगा तब तक औरते या लडकियां यूं ही अत्याचार की शिकार होती रहेगी। हज़ारों वर्षो की ये सोच बिना किसी मजबूत इरादे के नहीं बदलने वाली, इस पुरूष प्रधान समाज में वह घुट घुट कर जीने को मजबूर होगी। आज भी महिलायें पुरूषों के आगे घुटने टेकने को मजबूर है यही उनका धर्म बताया जाता है यह बताने का जिम्मा समाज के उन ठेकेदारों ने ले रखा है जो इस दमन के अधिकनायक है। हमें इन सबको बदलना होगा। हमें इस बदलाव के लिये किसी कानून की, नियम की सविंधान की जरूरत नहीं बस अपनी सोच में बदलाव की, मानसिकता में परिवर्तन की आवश्यकता है और इस बदलाव की शुरूआत हमें अपने आप से करनी होगी, अपने घर से करनी होगी। जिस दिन हम अपने आप में परिवर्तन कर लेगें उसी दिन हम महिला िंहंसा से मुक्त समाज की कल्पना को साकार कर लेंगे।

सुबोध गुप्ता
कार्यक्रम अधिकारी, जयपुर