Events - Kadam Badhate Chalo - कॉलेज के छात्रों के साथ उन्मुखीकरण कार्यक्रम

कॉलेज के छात्रों के साथ उन्मुखीकरण कार्यक्रम

Date: 24/12/2016  To 24/12/2016

Venue: विश्वविद्यालय महाराजा महाविद्यालय, जयपुर



रतिभागी- राष्ट्रीय सेवा योजना के छात्र व 4 प्रोफेसर
उपस्थित प्रतिभागियो की संख्या- 245

आयोजन का उद्देश्य-

  • महिला हिंसा व लिंगभेद को लेकर एक समझ का निर्माण करना
  • लिंग भेदभाव व महिला हिंसा के विरूद्ध सवेंदनशीलता को बढ़ाना।
  • समाज में होने वाली हर तरह की हिंसा के बारे में बताना।
  • महिला हिंसा के होने से रोकने में समाज की भूमिका को सही तरह पहचानना।
  • घर व समाज में महिला व लड़कियों के साथ होने वाले भेदभाव को रोकने का प्रयास करना व लोगों को जागरूक कर उनके सोच में परिवर्तन लाना।
  • समाज के अन्दर होने वाली महिलाओं या लड़कियों के साथ होने वाली हिंसा की घटनाओ के बारे में युवाओं की समझ व सोच को जानना।

कार्यक्रम के आयोजन का तरीका-

  • दस्तक फिल्म दिखा कर समाज की सोच को उजागर करना तथा महिलाआें के साथ होने वाली हिंसा के बारे में बताना।
  • IMPOSSIBLE DREAM दिखा कर लडकियों व औरतों के साथ होने वाले भेदभाव के प्रकार को दिखा कर तथा छान्नों के साथ खुली चर्चा।

परिचय -

सबसे पहले महाराजा कॉलेज के उप-प्राचार्य श्री मंगेज सिंह ने संस्था से आये सभी लोगो का स्वागत किया तथा उपस्थित छात्रों को कार्यक्रम के आयोजन का उद्देश्य बताया और गम्भीरता पूर्वक उसे समझने की अपील की। उसके बाद राष्ट्रीय सेवा योजना के समन्वयक प्रोफेसर श्री आर.डी. चौधरी ने राष्ट्रीय सेवा योजना के द्वारा किये जा रहे कार्या की जानकारी साझा की।

इसके बाद संस्था की वरिष्ठ कार्यक्रम अधिकारी सुश्री निवेदिता ने संस्था के बारे में बताते हुये कहा कि 1982 से स्थापित पार्टिसिपेटरी रिसर्च इन एशिया, (च्त्प्।) भारत में अनुसंधान एवं प्रशिक्षण के लिये एक वैश्विक केंन्द्र है। उन्होनें कहा कि वर्तमान में प्रिया संस्था के द्वारा महिलाआें व लडकियों के लिये हिंसा मुक्त व अनुकूल वातावरण बनाने की दिशा में पहल करते हुये कदम बढाते चलो (ज्ञठब्) कार्यक्रम चलाया जा रहा हैं। यह युवाओं की एक पहल है जो महिलाओं पर होने वाली किसी भी प्रकार की हिंसा को संबोधित करती है। इस अनोखे अभियान में युवाओ को समुदाय व विश्वविद्यालयो के साथ काम करने का अवसर प्रदान किया जाता है व साथ मिलकर महिलाओं व लडकियों के साथ होने वाली िंहंसा के खिलाफ़ एक रणनीति तैयार करते हैं।

इसके बाद दस्तक और IMPOSSIBLE DREAM फिल्म दिखायी गई। फिल्म के बाद महिलाओं/लडकीयों के साथ होने वाले भेदभाव और होने वालीं हिसां, उसके कारण व रोकने के उपायों पर चर्चा की गयी। महिलाओं व लडकियों के साथ होने वाली हिंसा तथा भेदभाव पर चर्चा के दौरान युवाओं के विचार

हिंसा क्या है?

सबसे पहले उपस्थित युवा छात्रों से महिला हिंसा या हिंसा को लेकर क्या समझ है, यह जानने की कोशिश की गयी । छात्र आेंकार सिंह ने कहा कि दूसरे के अधिकारां का हनन करना ही हिंसा है। उन्होनें कहा कि जब हम दूसरे के अधिकारो को छीनते है तो यह उस इंसान के साथ चाहे वो महिला हो या पुरूष हो हिंसा कहलाता है। कुलदीप ने कहा कि दूसरे की बात को महत्व न देना या उससे जबरदस्ती कोई भी ऐसा काम करवाना जिसे वो नहीं करना चाहता हिंसा कहलाती है। हंसराज का कहना था कि जब हम किसी के साथ जोर जबरदस्ती करते है तो वो हिंसा की श्रेणी में आता है। उन्होनें कहा कि हिंसा किसी के साथ भी कभी भी हो सकती है और यह किसी भी प्रकार की हो सकती है। विजय कुमार ने कहा कि सामने वाले को किसी भी तरह से परेशान करना ही हिंसा होती हैं। युवा मुदित ने बताया कि उसके हिसाब से किसी की भावनाओं को किसी भी तरह से ठेस पहुंचाना हिंसा है। अगर हम सामने वाले के जज्बातो की कदर न करे और उस पर दबाब डालकर कोई भी काम करवाये तो यह हिंसा माना जाता है। इसी तरह पवन ने अपने विचार व्यक्त करते हुये कहा कि किसी भी इंसान को इस तरह परेशान करना कि वो तनाव में आकर कुछ भी करने को मजबूर हो जाये जो कि सामाजिक दृष्टि से उचित नहीं हो वो हिंसा माना जायेगा।
इसी तरह इच्छा विरूद्ध कार्य करना, साम दाम दण्ड भेद का उपयोग कर उसे अनैतिक कार्य करने पर मजबूर करना, अधिकारो को दबाना, स्वतन्त्रता का हनन करना या छीनना, शारीरिक मानसिक और भावनात्मक नुकसान पहुंचाना, किसी की भावनाओं को ठेस पहुचाना इस तरह युवाआें ने अपनी समझ के हिसाब से हिंसा को परिभाषित किया।

हिंसा के कारणो पर चर्चा

चर्चा करने के दौरान हिंसा के कारणो पर बात करते हुये गांव से इसी साल कॉलेज में पढने आये बी.एस.सी प्रथम वर्ष के छात्र गोर्वधन सिहं ने कहा कि लड़किया भी तो आगे से पहल करती है इन सब बातो को लेकर अगर कोई इसका विरोध करता है तो उल्टा उसे ही कठिनाईयों का सामना करना पड जाता हैं। युवा ने कहा कि कुछ हिंसाये तो लडकियों के बिना सोचे समझे प्यार करने स,े दोस्ती करने स,े अन्धविश्वास करने से होती है। बी.ए फाईनल ईयर के छात्र वैभव ने कहा कि बलात्कार जैसी समाज को झकझोर देने वाली घटनाये केवल बुरी मानसिकता या सोच का नतीजा होता है और अन्य कोई कारण नहीं होता है। जिन लोगो के मतिष्क में बुरे विचार या गन्दी सोच होती है तो वो काम वासना के वशीभूत होकर इन हरकतों को अंजाम देते है। जिनके लिये सामने वाले की आयु,धर्म, मजहब या किसी अन्य बात का कोई मतलब नहीं होता है। बी.कॉम के छात्र मनीष जांगिड ने कहा यह घटनाये अपने उपर नियन्त्रण न रख पाने के कारण होती है। उसने कहा कि कभी कभी अपनी खीज या ईर्ष्या के कारण भी इस तरह की घटनायें देखने को मिलती है। छात्र विनीत ने कहा कि माहौल खराब होने के कारण और लडकिंयों के कमजोर होने के कारण वो हिंसा की शिकार होती है। उसने कहा कि लडकियां अपनी सुरक्षा खुद नहीं कर पाती इसलिये उन्हें कमजोर मानकर उन्हे हिंसा का शिकार बनाया जाता है।

लिंग भेदभाव पर बात करते हुये बीं.टेक. के छात्र रजत धाकड ने कहा कि जेन्डर सेक्स का सभ्य रूप है। रजत ने कहा कि हम सेक्स को पढे़ लिखों की भाषा में जेन्डर कहा जाता है। लिंग भेदभाव का कारण बताते हुये छात्र सुभाष ने कहा कि हमारा समाज बहुत ही प्राचीन काल से पितृसत्तात्मक है और पुरूष को ही घर का मुखिया समझा जाता है। सुभाष ने कहा कि तमाम प्रयासों के बाद भी समाज की मानसिकता पूरी तरह से बदल नहीं पाई है। इसी चर्चा के दौरान एक अन्य छात्र विशाल चौघरी ने कहा कि पूर्वज जो रीति परम्परा बना कर चले हम आज भी उन्ही परम्पराओं को ढो रहे है और इसी कारण महिंलाओ का अपने अधिकारो के लिये संघर्ष करना पडता है और वो हिंसा की शिकार होती हैं। विशाल चौघरी ने कहा कि यह सब अब बदलना चाहिये और यही समय की मांग है। छात्र सोनू कुमार ने कहा कि लडके व लडकियों के पालन - पोषण में भी भेद होता है लडकिया घर के काम में हाथ बँटाती है और इसी तरह यह अन्तर कदम कदम पर बढता जाता है। बी.ए कर रहे छात्र जतिन ने कहा कि हमारे समाज में प्राचीन समय से ही औरत को दोयम दर्जे का समझा जाता है वह अपने घर या परिवार से लेकर सब जगह अपने अधिकारों की, इज्जत की लडाई लडती है और हर कदम पर संघर्ष करती हुई अपनी जिन्दगी गुजार देती है। छात्र लवेश ने कहा कि औरत को केवल काम करने व बच्चा पैदा करने की एक मशीन समझा जाता है पर अब धीरे धीरे परिवर्तन आ रहा है लड़किंया भी बराबरी से सारे काम करने लगी है उन्होनें पुरूषो के वर्चस्व वाले क्षेत्रों में भी अपनी उपस्थिति दिखाई है। छात्र हेमराज ने कहा कि लड़के इमोशनल नहीं होते तो रो नहीं सकते लड़कियां बहुत इमोशनल होती है इसलिये हिंसा की शिकार हो जाती है और यह आसानी से रो लेती है। जबकि लडकों के साथ ऐसा नहीं होता है। और कुछ छात्रों ने इन सबके पीछे पुरूष प्रधान समाज की मान्यता, रूढिवादी परम्परायें, अन्धविश्वास, अशिक्षा, गरीबी, एकल परिवार, जागरूकता का अभाव, यौन विषयो पर बातचीत न होना, लडको को संस्कार नही देना, आम लोगो की खामोशी जैसे कारणों को जिम्मेदार बताया।

छात्र कमलेश ने कहा कि इस समाज में पुरूष अपनी झूठी इज्जत और मान सम्मान के लिये इस तरह का भेदभाव लडकी के पैदा होने से लेकर आखिर तक करते है। लडकी के पैदा होने पर कभी खुशी नहीं मनायी जाती है घर के बुजुर्ग लोग ताना दे दे कर मां बेटी का जीना मुश्किल कर देते है। सुश्री निवेदिता ने अपने सहयोगकर्ता के रोल में चर्चा को आगे बढाते हुए कहा कि यह सब भेदभाव प्रकृति का बनाया नहीं हैं मनुष्य ने अपनी सुविधानुसार औरत को घर का साजो सामान बनाये रखने तथा उसे अपने अधीन रखने के लिये इस तरह के रीति-रिवाज व परम्परायें बनाई है जिसमें औरत को केवल घर में काम करने वाली महिला, बच्चे को पैदा करने के लिये एक माध्यम और हमेशा पुरूष की दासी समझा गया। उन्होनें कहा कि जेंडर हमारे समाज के द्भारा एक निर्मित सामाजिक-सांस्कृतिक शब्द है जो कि समाज में महिला व पुरूषों के बीच के अंतर को बताता हैैं जबकि सेक्स प्राकृतिक रूप से आदमी या औरत के अंतर को परिभाषित करता है। अर्थात लिंग(जेंडर) परिवर्तनीय होता है जबकि सेक्स अपरिवर्तनीय होता है लिंग मानव निर्मित है जबकि सेक्स प्राकृतिक है। लिंग के आधार पर ही समाज में महिलाओं के साथ भेदभाव किया जाता है उन्हे आदमी की तुलना में कमजोर माना जाता है और वो घर में शोषित, अपमानित तथा भेदभाव से पीडित होती हैं। उन्होनें कहा कि हम लडको की चाह में लडकियों को जन्म से पहले ही मारते आ रहे है और अगर वो नहीं मारी जाती है तो हम लोग जीवनभर उनके साथ भेदभाव करने के तरीके ढूँढ लेते है, यह अलग बात है कि हमारे समाज में औरत को देवी का स्वरूप माना जाता है लेकिन हम उसे इंसान के रूप में पहचानने से मना कर देते है या स्वीकार करने को तैयार नहीं होते है। उन्होनें छात्रों से कहा कि हम देवी की पूजा तो करते है पर समाज में लडकियों का शोषण करते है। हमारी कथनी और करनी में बहुत फर्क होता है। उन्होनें कहा कि अनेक मामलो में मौखिक प्रताडना थोडे समय के बाद शारीरिक प्रताडना में बदल जाती है और यह कभी कभी बहुत भयानक रूप में सामने आती है। उन्होने कहा कि हमें इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि पीडित महिला समाज के साथ जुड नहीं पाती और न ही वो समाज की गतिविधीयो में भाग ले पाती है। जिसके न केवल महिला के जीवन की गुणवत्ता पर बल्कि परिवार के उपर भी इसका बहुत प्रभाव होता है।

सुश्री निवेदिता ने छात्रों से पुछा कि क्या लडकियाँ कमज़ोर होती हैं ? कुछ ने कहा हाँ पर कुछ ने खिलाड़ी महिलाओं का उदाहरण देते हुए कहा नहीं। चर्चा को आगे बढ़ाते हुए निवेदिता ने कहा कि हम लोग लड़कियों को कमजोर मानते है जबकि वो कमजोर नहीं होती है पर उनकी परवरिश इस तरह होती है कि वो कमजोर हो जाती है। हम हर स्तर पर उससे भेदभाव करते है चाहे उसके पहनने वाले कपडे हो या उसके खेलने वाले खिलौने हो। उन्होने कहा कि जन्म के समय हम बिना देखे यह नहीं बता सकते कि कौन लडकी या कौन लडका? यह सब भेदभाव हमारे द्वारा बनाया गया है। उन्होने कहा कि बराबर का काम करने पर भी महिलाओं को पुरूषों की अपेक्षा कम वेतन मिलता है और न ही उन्हे पुरूषों के बराबर सुविधाये मिलती है। उन्होने कहा कि महिलाओं को समान रूप से सम्मान व कार्य मिलना चाहिये तभी हम महिलाओं को सशक्त बनाया जा सकेगा और इसकी शुरूआत हमें अपने आप से अपने घर से करनी होगी।

समाज का योगदान और महिंला हिंसा की रोकथाम

छात्र नवीन कुमार ने कहा कि हम सब अपने आस पास होने वाली घटनाओं को देखकर भी अनजान बने रहते है और इससे करने वालो का हौसला बढता है। अगर हम समय पर ही इन सबका विरोध करे तो इस तरह की घटनाओ में कमी आ सकती है। बी.टेक के छात्र हेमराज ने कहा कि प्रकृति के और परिवार के सन्तुलन के लिये समाज में औरतो का बराबरी का दर्जा बहुत जरूरी है और औरतो को उनके साथ होने वाले किसी भी प्रकार की हिंसा या भेदभाव का पुरजोर विरोध करना चाहिये तथा समाज के लोगों को इसमें सहयोग कर उस महिला का भावनात्मक सहयोग करना चाहिये। राजनीति विज्ञान के छात्र अजीत कुमार ने कहा कि हमारा समाज ही इस तरह की घटनाओं के लिये जिम्मेदार है न कि पीडित। उसने कहा कि हमारी सोच बदलनी होगी तब जाकर परिवार की सोच बदलेगी फिर समाज की और उसके बाद देश की पर सबसे पहले इसकी शुरूआत अपने आप से करनी होगी हमें हर महिला या लडकी को इज्जत देनी सीखना होगा। बी.ए के तृतीय वर्ष के छात्र वेदप्रकाश ने पूछा कि हम सब जानते है सब समझते है फिर भी यह सब क्यो करते है ? और इसी प्रश्न का उत्तर अपने आप खोजने तथा अगली चर्चा यहीं से प्रारम्भ करने का विचार कर इस कार्यक्रम को सुबोध गुप्ता की निम्न लाईनो के साथ समाप्त किया गया।

होती है धरा और आसमान लडकियां, पावन पुनीत विष्णु का विधान लडकिया।
होती है पवन पुत्र सी प्रणम्य लडकिया, अदभुत,साहसी,अटूट और अदम्य लडकियां।
गंगा का ज्ञान भारती का भाल है लडकी, दुर्गा का रूप काली का कपाल है लडकी।
आदि, अनन्त, अन्त से विशाल है लडकी, रांणा का भाल और शिवा की ढाल है लडकी।
पावन पुनीत प्रणम्य गायत्री है लडकी, है पत्नी की है प्रतिज्ञा तो सावित्री है लडकी।
ब्रहमां की ब्रहम शक्ति का वरदान है लडकी ।
है अगर मां का रूप तो भगवान है लडकी।

निष्कर्ष-

  • इस कार्यक्रम के अन्त में राष्ट्रीय सेवा योजना के समन्वयक प्रोफेसर श्री आर.डी. चौधरी ने कहा कि बहुत जल्दी ही एक चर्चा का आयोजन किया जायेगा जिसमें महारानी कॉलेज की लडकियाँ भी शामिल करने का प्रयास किया जायेगा।
  • छात्र रोहिताश्व ने कहा मैं और मेरे सभी दोस्त इस बात का प्रयास करेंगें कि समाज में महिला या लडकी किसी भी तरह के शोषण का शिकार न हो और हम सभी अपने परिवार में यह सुनिश्चित करने का प्रयास करेगें।
  • छात्रो ने यह भी कहा कि वो बहुत ही जल्दी एक फेसबुक पेज बनायेगें जिसमें समाज के हर तबके को, सामाजिक संगठनो, अध्यापको, छात्रों, स्कूलो को कदम बढाते चलो से जोडने का अभियान चलाया जायेगा और किसी भी प्रकार की परेशानी में मदद का प्रयास किया जायेगां